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Andhere se Ujale Tak

ISBN: 9789381005903 Category: Author: Publisher:
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295.00

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Book Condition: New
Format: Paperback
Language: English
Pages: 260

Availability: In stock


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Andhere se Ujale Tak

एक हदय हो भारतजननी’ सूत्र का उच्चारण तो हम अत्यंत उत्साह से करते हैं-खास तौर से 15 अगस्त या 26 जनवरी के दिन तो बड़े भारी पैमाने पर।

किन्तु क्या वास्तव में इस सूत्र की विभावना का कार्यान्वयन हमारे देश की विभिन्न प्रादेशिक भाषाएँ, संस्कति, धर्म और संस्कारों का परस्पर सहयोग, आदान-प्रदान और उनके स्वीकार की अपनी क्षमता पर अवलंबित है! स्वयं का बहुश्रुत-विद्वान प्रतिष्ठापित करने के प्रच्छन्न उद्देश्य से हम अक्सर शेक्सपीयर एडगर एलन पो, हेमिंग्वे, सात्र, काफका, कामू आदि दर्जनों विदेशी ग्रंथकारों के नाम पहाड़ से गिरते हुए प्रताप की तरह गूँजते रहते हैं जब भारतीय ग्रंथों या साहित्यकारों के नाम का संबंध पैदा होता है, हम बहुधा रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद आदि दो चार नामों से आगे बढ़ नहीं पाते हैं! कारण साफ हैं-हम भारतीय साहित्यकार, प्रकाशक, पाठक आदि अपनी-अपनी प्रादेशिक भाषाओं के परिचय से अगर आगे उठते भी हैं तो पश्चिम दिशा की ओर दष्टि करते हैं-हमारे देश की सभी भारतीय भाषाओं में इतनी समद्ध रचनाएँ है जहाँ तक हम दुर्भाग्यवश पहुँच नहीं पाये हैं।

साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट आदि सरकारी और अर्ध सरकारी संस्थाएँ इस आदान-प्रदान के कार्य में कई सालों से जुड़ी तो है परन्तु ऐसी सरकार को पुरस्कत संस्थाओं के लिये भारी मात्रा में कानूनी सीमाओं के बीच कार्यवाही करनी पड़ती है। फलस्वरूप आदान-प्रदान के मूलगत भाव से प्रकाशित-अनुवादित-रचनाएँ पाठक के हाथ तक पहुँचते-पहुँचते वद्ध हो जाती हैं। सिर्फ इन इनीगिनी संस्थाओं से काम पूरा हो नहीं पायेगा। व्यावसायिक प्रकाशन गह और साहित्य के प्रति भारतीय संकल्पना आत्मसात करने वाले निजी संगठनों के द्वारा यह काम अधिक मात्रा में सफल हो सकता है।

एक भय स्थान भी है-अगर प्रादेशिक भाषा के प्रकाशन गह, अपनी-अपनी भाषा के सिवाय अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी भाषा के अनूदित ग्रंथ प्रकाशित करेंगे भी, तो उस संबंधित भाषा में अपने प्रकाशनों को पहुँचाना उनके

Weight.350 g
Book Condition

New

Country of Origin

India

Language

English

Pages

260

Product Form

Paperback

Publishers

Raj Publishing House

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