पूजनीय श्री गुरुजी व्यक्ति नहीं; व्यक्तित्व थे, मानवता के दृष्टिकोण थे, आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा थे, समरसता के सूत्रधार थे तथा संगठनशास्त्र के पुरोधा थे। राष्ट्र के साथ उनका इतना तादात्म्य हो गया था कि वे उसके पर्याय बन गए थे। एक पत्रकार ने तो यहाँ तक कहा कि गुरुजी जब चलते थे तो लगता था सारा राष्ट्र चल रहा है, वे जब बोलते थे तो लगता था सारा राष्ट्र बोल रहा है। द्वितीय सरसंघचालक के रूप में उन्होंने ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ को विषम परिस्थितियों से उबारा ही नहीं, उसे विशालता भी प्रदान की।
उनके विचार, जीवन-दर्शन को शब्दों में बाँधना यद्यपि कठिन था तो भी ‘श्री गुरुजी समग्र संकलन समिति’, नागपुर ने ‘श्री गुरुजी समग्र’ के रूप में बारह खंडों में बाँधने का सफल प्रयास किया और स्वामित्व अधिकार सम्पन्न डॉ. हेडगेवार समिति, नागपुर ने इसको छापने का दुरूह कार्य सुरुचि प्रकाशन, दिल्ली को सौंपा जिसने कृपा पूर्वक उसका निर्वहन किया।
किन्तु पाठकों की रुचि और महती माँग को ध्यान में रखकर उन बारह खंडों का संक्षिप्त सार-संकलन एक ही खंड “श्री गुरुजी : दृष्टि और दर्शन” के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया। हम ‘श्री गुरुजी समग्र संकलन समिति, तथा डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति’, नागपुर के आभारी हैं जिन्होंने “श्री गुरुजी समग्र” की अपार सफलता को देखते हुए पुनः यह कार्य हमें सौंपा है- पुनः अतीव आभारी हैं।





























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