Sampoorna Ramayana
महर्षि वाल्मीकि आदि कवि हैं। पुराणों के अनुसार प्रचेत उनके पिता तथा चर्षणी उनकी माता थीं। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसीलिए महर्षि वाल्मीकि को ‘प्रचेतस’ भी कहा जाता है। वे परम ज्ञानी ऋषि थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए वाल्मीकि के शरीर को दीमकों ने अपनी बांबी बनाकर ढक लिया। साधना के उपरांत जब वे दीमकों की बांबी से बाहर निकले, तो लोग उन्हें ‘वाल्मीकि’ कहने लगे। संस्कृत में बांबी को वाल्मीकि कहा जाता है।
एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर बैठे प्रकृति की अलौकिकता में खोए हुए थे। वहीं क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा विहार कर रहा था। तभी एक व्याध (शिकारी) ने एक क्रौंच को अपने पैने बाणों से बींध दिया। एक क्रौंच के मरते ही दूसरे क्रौंच ने उसकी याद में चीत्कार करते हुए तड़प-तड़पकर अपने प्राण त्याग दिए। इस चीख-पुकार से महर्षि का ध्यान भंग हो गया। दोनों पक्षियों को तड़पते हुए देखकर उनके मुंह से व्याध के लिए शाप रूपी जो उद्गार निकले, वह लौकिक छंद में एक श्लोक के रूप में था-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः कामोहितम्।।
अर्थात् हे दुष्ट! तुमने प्रेम में मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा, तुझे कभी प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी और तुझे भी वियोग सहना पड़ेगा।
इसी छंद में महर्षि वाल्मीकि ने देवर्षि नारद से सुनी राम-कथा के आधार पर ‘रामायण’ की रचना की।






























Reviews
There are no reviews yet.