जौन एलिया – बहुत तेज़ी से और बेपनाह लिखने वाले शायर थे, जिनकी शख़्सियत और शायरी ने अदब की दुनिया में अनोखी कशिश पैदा की।
उनकी शायरी का पहला संग्रह ‘शायद’ लगभग तीस साल की देरी से, दोस्तों के लगातार ज़ोर देने पर, 1990 में प्रकाशित हुआ। यह किताब इतनी लोकप्रिय हुई कि एक साल में इसका दूसरा संस्करण, फिर तीसरा और सिर्फ़ दो महीने बाद चौथा संस्करण छापना पड़ा। कुछ ही वर्षों में शायद वह मक़बूलियत हासिल कर गई जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी।
जौन एलिया का दूसरा मजमूआ ‘यानी’ 2003 में उनके देहांत के बाद प्रकाशित हुआ, जबकि उन्होंने इसे 1996 में ही तैयार कर लिया था। इसके बाद 2004 में ‘गुमान’ आया और महज़ छह महीने में ही इसका भी दूसरा संस्करण छापना पड़ा। फिर ‘लेकिन’ और ‘गोया’ (2008) प्रकाशित हुए और दोनों ने वही लोकप्रियता हासिल की। हाल ही में 2024 में उनका मजमूआ ‘क्यों’ भी सामने आया।
शायद के बाद गुमान, लेकिन, गोया और क्यों- इन सभी ने यह साबित किया कि जौन की शायरी सिर्फ़ मुशायरों की रौनक नहीं है, बल्कि ऐसा अनमोल ख़ज़ाना है जो हर दौर और हर दिल पर असर छोड़ता है।
जौन एलिया का पहला मजमूआ ‘शायद’, जिसे उनके चाहने वालों ने अदब की पहचान बना दिया, एक बार फिर उनके बेइंतिहा मुहब्बत करने वालों के लिए पेश किया जा रहा है।
यह किताब सिर्फ़ एक मजमूआ नहीं है बल्कि जौन की शायरी का वह पहला सफ़र है जिसने उर्दू अदब की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।
जौन के चाहने वालों के लिए शायद सिर्फ़ एक किताब नहीं, बल्कि एक ऐसा





























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