पीपल का वृक्ष अपने-आप में अलग दुनिया है और उसका हर पत्ता एक कहानी है।
पीपल का पेड़ मुझे बचपन से आकर्षित करता रहा है। पिछले 48 वर्षों में मैंने इसे लगाया, बचाया और इसके संरक्षण का संदेश फैलाया है। यह पुस्तक उसी लंबे, मीठे-कड़वे और पवित्न साथ का साझा अनुभव है।
इस पुस्तक का विचार 2012 में जन्मा था, लेकिन इसे पूरा होने में एक दशक से भी अधिक समय लगा और अंततः नवंबर 2024 में हुई एक सड़क दुर्घटना ने मुझे वह ठहराव और समय दिया, जिसकी मुझे आवश्यकता थी। इन पन्नों को लिखते हुए मैंने जैसे ख़ुद को एक नए सिरे से रचा। वे अनगिनत अनुभव, जिन्हें कभी मैंने यूँ ही जाने दिया था, अचानक स्पष्ट और ठोस होकर मेरे सामने आ खड़े हुए।
यह एक खोज की स्मरण-यात्ना है, भूतों और देवदूतों की, पेड़ों और शिक्षकों की तथा अस्तित्व के उस शांत चमत्कार की, जिसकी ओर हम अकसर ध्यान नहीं देते।
भारत के 220 से अधिक ज़िलों की यात्रा के दौरान, मैंने समझा कि पेड़ों पर भूतों से जुड़ी नानी की कहानियाँ दरअसल इस बात का संदेश थीं कि आस्था कैसे जंगलों की रक्षा करती है। कैसे सरल,
ईमानदार और निस्वार्थ सेवा के छोटे-छोटे कार्य- जो महत्त्वाकांक्ष नहीं, बल्कि भक्ति से उपजते हैं- बिना किसी संरचना या नाम के भी लाखों लोगों को एक आंदोलन से जोड़ सकते हैं।
























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