Kirdaar
तुम जरा भी घबराना मत मेरे लाल, अकेला नहीं है तू.. हां!’ – बचपन में जब पहली बार ये शब्द मेरे कानों ने सुने थे तब बडे प्यारे लगे थे ये बोल। उस वक्त भी माँ के इस मीठे बोल ने मेरे दिल को सुकुन पहुँचाया था। इसलिए नहीं कि ये शब्द माँ के थे, इसलिए भी नहीं कि उस समय मैं बहुत छोटा था, बल्कि इसलिए कि इन शब्दों में निःसंदेह सत्य अनुभव हो रहा था। जीवन में मैंने खुद महसूस किया हुआ परम सत्य !
माँ के इस बोल सुनने के बाद बुखार में सुलगती आँखों से मैंने अस्पताल के वॉर्ड में नजरे घुमाकर ठीक से चारो ओर देखा था, तब पता चला कि यकीनन मैं अकेला कहाँ था! आसपास के बिस्तर पर मेरे जैसे कितने बीमार बच्चे स्वस्थ होने का इंतजार कर रहे थे। मुझे ख्याल हुआ कि अस्पताल केवल बूढे-बुजुर्गों को अंतिम समय में ट्रीटमेन्ट देने का ही नहीं, परन्तु हर उम्र के लोगों को बीमारी से बचाने का बहुत पवित्र स्थान है। मूलतः एक बात मेरी समझ में आई कि बीमारियों के सामने लडने में मैं अकेला नहीं और लोग भी है।
बस, यही खयाल सुकुन देता रहा.. मैं अकेला नहीं।
फिर तो जीवन के हर मोड पर मैंने ये बात बराबर समझ के याद रख ली
थी। पढ़ाई में तो यही नियम मुझे सब से अधिक काम आया था। वरना अकेले अकेले पढ़ना मेरे बस की बात कहाँ? इसी वजह से मैंने अधिक से अधिक दोस्त बना लिये थे। किसी दोस्त के साथ पढ़ने जाना, किसी के साथ होस्टल में रहना, किसी के साथ मूवी देखना, किसी के साथ मिलकर प्रोजेक्ट वर्क खतम करना, किसी के साथ घुमने जाना, किसी की मदद से काम निपटाना। सारी तकलीफों के हल मिल ही जाते.. अगर एक दोस्त साथ हो तो। समय के साथ दोस्त आते-जाते-





























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