‘कई चांद थे सरे-आसमां इक्कीसवीं सदी की ही नहीं, उर्दू फिक्शन की बेहतरीन किताब है-असलम फरूखी
18वीं सदी के राजपूताने से शुरू होने वाली और एक सदी से कुछ ज़्यादा समय बाद दिल्ली के लाल किले में खत्म होने वाली यह दास्तान हिंदुस्तानी फनकार की रूह की गहराइयों में उतरने की कोशिश करने के अलावा हिंद-इस्लामी तहजीब, साहित्यिक समाज, अंग्रेज़ी सियासत और उसकी वजह से तहज़ीब और तारीख के बदलते हुए चेहरे हमारे सामने पेश करती है। यह उपन्यास हमें ये भी बताता है कि 18वीं और 19वीं सदी के हिंद-इस्लामी समाज में शायर, आशिक, फनकार और आम इन्सान, जिंदगी और जज़्बाती और रूहानी तौर पर मुकम्मल होने की तलाश किस तरह और किन उसूलों के आधार पर करते थे।
देहली की मिटती हुई बादशाहत के साए में फलने-फूलने वाली इस तहजीब का मंजरनामा गालिब, जौक, दाग, घनश्याम लाल आसी, इमामबख़्श सहबाई हकीम अहसनुल्लाह खां के साथ-साथ बहादुरशाह ज़फ़र, मलिका जीनतमहल और नवाब शम्सुद्दीन अहमद ख़ां जैसे बहुत से वास्तविक किरदारों से भी जगम रहा है। इस उपन्यास को उस सदी की हिंद-इस्लामी तहज़ीब में कौमी एकजुट जिंदगी, मुहब्बत और फन की तलाश की दास्तान कहें तो सही होगा।
‘मुद्दतों बाद उर्दू में एक ऐसा उपन्यास आया है, जिसने हिंदो-पाक की अदबी दुनिया में हलचल मचा दी है। क्या इसका मुकाबला उस हलचल से किया जाए जो उमरावजान अदा ने अपने वक्त में पैदा की थी… -इंतजार हुसैन


























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