Coffee Ke Cup Mein Chaay
एक लेखक, जिसे यात्राएँ और लेखन लगातार अपनों से दूर ले जाते रहे हैं, पिता की मृत्यु के वर्षों बाद एक दृश्य उसे स्मृतियों की उन परतों तक वापस ले जाता है, जिन्हें वह शायद भूल जाना चाहता था। वहीं से खुलते हैं पिता के अनकहे रिश्ते, रूमिका की उपस्थिति और उसके अपने जीवन के वे हिस्से, जिनसे बचते हुए वह मुंबई से कश्मीर और फिर यूरोप तक भटकता है।
‘कॉफ़ी के कप में चाय’ स्मृति, परिवार, अकेलेपन, अपराधबोध और उन रिश्तों का संवेदनशील उपन्यास है जिन्हें कोई आसान नाम नहीं दिया जा सकता। इसमें यात्रा केवल जगहों की नहीं, अपने अतीत और भीतर की उलझनों तक लौटने की भी है। और कॉफ़ी के कप में मिली चाय की तरह, कभी-कभी पराई दुनिया में अचानक मिला अपनापन ही सबसे बड़ी राहत बन जाता है।



























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