Jati Aur Sampradayikta Ke Vishanu
वे लोगों के साथ सफर करते हैं, उनका रूप बदलता है, अलग-अलग बोलियों और भाषाओं को अपनाते हुए वे कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं।
‘जाति और साम्प्रदायिकता के विषाणु : भारतीय भाषाओं की लोकोक्तियाँ, कहावतें और मुहावरे’ में ऐसी लोकोक्तियों और कहावतों-मुहावरों का संचयन और विश्लेषण किया गया है जो भारतीय समाज के कुछ नकारात्मक मूल्यों-मान्यताओं का वहन करते हुए देश की लगभग तमाम भाषाओं में व्याप्त हैं। ऐसे मुहावरे जिनमें भारतीय समाज की जातिवादी मानसिकता और साम्प्रदायिक विद्वेष समोया हुआ है।
इस पुस्तक में हिन्दी के साथ-साथ मुंडा वर्ग की संताली, मुंडारी और हो से लेकर तिब्बती, बर्मी, बोडो और दक्षिण की तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम तक की जातिपरक लोकोक्तियों का संग्रह इसमें किया गया है। इसके साथ सभ्यता, भाषा-बोली, धर्म और लिपि पर भी पुस्तक में कुछ सामग्री प्रस्तुत की गई है, जो भाषा और समाज के अन्तर्सम्बन्धों को समझने में मदद करती है।


























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