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Jain Painting Style in Indian Painting

ISBN: 9789381005408 Category: Author: Publisher:
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Original price was: ₹495.00.Current price is: ₹450.00.

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Book Condition: New
Format: Paperback
Language: Hindi
Pages: 250

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Jain Painting Style in Indian Painting

भारतीय ग्रंथागारों व संग्रहालयों में उपलब्ध ताड़पत्रीय एवं कागदीय जैन पाण्डुलिपि चित्रों से सहज ही प्रतीति होने लगती है कि चित्रकला के विकास और संरक्षण हेतु जैन संस्कृति की जीवन-प्रक्रिया मुख्य अंग रही है। ग्यारहवीं शताब्दी से 19 वीं शताब्दी के बाद तक जैन धर्म के अनेक ग्रंथ चित्रित किये गये।

अभी तक की खोजों के आधार पर सबसे प्राचीनतम् ताड़पत्रीय पाण्डुलिपि जैसलमेर जैन ज्ञान भण्डार-जैसलमेर (राज.) के ग्रंथ भण्डार में स्थित 1060 ई. की ‘ओघनिर्युक्ति वृत्ति एवं इसी के समकालीन रचित ‘दशवैकालिक सूत्रवृत्ति’ है।

विभिन्न प्रभावों को आत्मसात् करने से पहले जैन चित्र शैली अपनी निजी विशेषताओं यथा-चहरे की सीमा रेखा से बाहर निकली हुई परली आँख, नुकीली नाक, दुहरी ठुड्डी, जकड़े हुये हाथ तथा ऐंठी अँगुलियाँ, उभारयुक्त वक्षःस्थल तथा क्षीण कटि आदि को समाहित किये हुऐ हैं जिनकी अलग ही पहचान है। 14 वीं शताब्दी में जैन चित्र शैली में क्षेत्रीय प्रवृत्तियों के साथ विदेशी प्रभावों की झलक दिखाई पड़ने लगती है। इस काल में रचित पाण्डुलिपि चित्र अत्यन्त अलंकृत है और इनके मूल पाठ सोने और चाँदी की स्याहियों से लिखे गये हैं।

वस्त्राभूषणों की दृष्टि से जैन चित्र शैली में मुख्यतः मानवाकृतियों में धोतियों की सज्जा बड़ी मनमोहक है तथा नख से शिख तक मणि-मालाओं की प्रधानता देखने को मिलती है।

16 वीं शताब्दी के पश्चात् जैन चित्रित पाण्डुलिपियों का निर्माण मुगल एवं राजपूत शैली का प्रभाव लिये हुये हुआ। अकबर के सिंहासनारूढ़ होने से कला एवं संस्कृति का बड़ा विकास हुआ। इसका प्रमुख कारण भारतीय चित्रकारों को मुगल दरबार में आदर मिलना था। जैन पाण्डुलिपि चित्रों पर इसका प्रभाव मानवाकृतियों उसके वस्त्राभूषणों, चित्रण-प्रक्रिया एवं तकनीकी दक्षता के साथ ही चित्रकारों की बौद्धिक सूझबूझ तथा मौलिक आधारों पर भी प्रमुख रूप से पड़ा है।

Weight350 g
Book Condition

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Country of Origin

India

Language

Hindi

Pages

250

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Paperback

Publishers

Raj Publishing House

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