Aparajita: Jeevan, Karm aur Netrutva Par Ek Kamkaji Mahila ke Notes
छोटे शहर, बड़े सपने और बेमिसाल सफलताएं
भिलाई और बोकारो जैसे छोटे शहरों में पली-बढ़ी अरुन्धति भट्टाचार्य ने कभी नहीं सोचा था कि वह एक दिन भारत के सबसे बड़े बैंक की चेयरमैन बनेंगी। संयोग से उनके एक दोस्त ने उन्हें बैंक के प्रोबेशनरी ऑफिसर्स की प्रवेश परीक्षा के बारे में बताया। उन्होंने आवेदन दिया और उनका चयन हो गया। वहीं से उनके चालीस साल लंबे शानदार बैंकिंग करियर की शुरुआत हुई।
अपराजिता अरुन्धति के बैंकिंग जीवन की कहानी है। यह किताब बताती है कि बैंकिंग जैसे पुरुष-प्रधान क्षेत्र में उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इस किताब में वह 1960 के दशक के अपने बचपन और स्कूल के दिनों के बारे में बताती हैं, कॉलेज की पढ़ाई के दौरान कोलकाता में बिताए समय की यादों को पाठकों के साथ साझा करती हैं और फिर विस्तार से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) में बिताए समय के बारे में बात करती हैं।
एक महिला बैंककर्मी के लिए परिवार को संभालने के साथ ऐसी नौकरी करना आसान नहीं होता जिसमें लगातार तबादले होते हों। अरुन्धति के जीवन में ऐसे कई मौके आए जब उन्होंने नौकरी छोड़ने पर विचार किया ताकि अपनी निजी आकांक्षाओं और पारिवारिक ज़रुरतों के बीच सुंतलन बैठा सकें। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने सकारात्मक सोच और मुस्कराहट के साथ हर चुनौती का सामना किया। उन्होंने हर नई ज़िम्मेदारी को कुछ नया सीखने और खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढालने के मौके के तौर पर देखा।
एसबीआई की चेयरमैन के तौर पर उन्होंने बैंक को उसके सबसे मुश्किल दौर से बाहर निकाला। जब एनपीए संकट के कारण बैंकिंग व्यवस्था में लोगों का भरोसा डगमगा गया था तो उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में फिर से भरोसा बहाल करने का काम किया। उनके नेतृत्व में एसबीआई देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ ही ग्राहक केंद्रित और डिजिटली एडवांस बैंक के तौर पर सामने आया। उन्होंने मानव संसाधन के क्षेत्र में ऐसे कई नए कदम उठाए, जिन्हें इस उद्योग में पहली बार अपनाया गया था और जिन्हें बाद में दूसरे बैंकों ने भी अपनाया।
निर्भीकता, सरलता और विनम्रता के साथ लिखी गई अपराजिता एक ऐसी कहानी है, जो आपको चुनौतियों का सामना करने, बाधाओं को तोड़ने और आगे बढ़कर नई ऊंचाइयों को छूने के लिए प्रेरित करेगी।






























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