Udaas Logon Ka Hona Bahut Zaruri Hai
तर्कश प्रदीप का जन्म 24 सितम्बर, 1984 को गाँव खैरपुर, पंजाव में हुआ। डीएवी महाविद्यालय, अबोहर से एम.ए. (पंजाबी) तथा डीएवी शिक्षा महाविद्यालय अबोहर से एम. एड. करने के पश्चात उन्होंने शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार में बतौर पंजाबी शिक्षक कार्य किया। वर्तमान में वे राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, दिल्ली में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उर्दू एवं पंजाबी अदबी हल्कने में बतौर रंगकर्मी, अनुवादक एवं शाइर सक्रिय है। ‘उदास लोगों का होना बहुत ज़रूरी है’ उर्दू ज़बान में तर्कश प्रदीप का पहला/पहली का राज़ल-संग्रह/किताब है।
बक़ौल-ए-फ़रहत अहसास “इस किताब में, बड़ी तादाद में ऐसे शे’र हैं जो नज़र से गुज़रते ही ऐ’लान और दा’वा कर देते हैं कि हम शे’र है और हम फ़ौरन इस ऐ’लान और दा’वे पर ईमान ले आते हैं। ये सूरत तभी पैदा होती है जब कोई शख़्स बाज़ाब्तः (विधिवत) शे’र कहने से पहले ही से शाइ’री कर रहा हो, या ‘नी शाइ’री उसके होने का हिस्सा हो, लफ़्ज़ों में ज़ाहिर न होने के बावजूद। ‘तर्कश’ के हाँ शाइ’री का मोआ ‘मला, उनकी साँसों और धड़कनों की तरह है या ‘नी उन में घटित होती है, अपने आप, फ़ित्नी अंदाज़ में, कुछ इस तरह कि न हो तो वो ख़ुदन रहें।
तर्कश गहरे महसूसात और अनोखे तज्रबात के शाइ ‘र हैं। ये किताब हमें क़दम-क़दम पर खुशगवार हैरतों से दो-चार करती है और उम्मीद बंधाती है कि हम आईदा एक तवील अरसे तक तहद्दार और पुर-लुत्फ़ अशआर की एक रौशन से रौशनतर होती जाने वाली कहकशाँ से रू-ब-रू रहने वाले हैं।”
























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