Dwivedi Varshik Rashifal 2027
ज्योतिषशास्त्र का इतिहास ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही प्रारम्भ होता है तथा ब्रह्माण्ड की स्थिति पर्यन्त अविच्छिन्न रूप से गतिमान रहता है। अनन्त आकाश में विद्यमान अनन्त ज्योतिषपिण्डों का ज्ञान अभी तक मनुष्य नहीं कर पाया है। मनुष्य की अपनी सीमा है, आकाश निःसीम है। फिर भी मनुष्य ने अन्तरिक्ष के अनेक रहस्यों को सुलझाने में सफलता प्राप्त की है तथा आगे भी सतत् प्रयत्नशील है। ब्रह्माण्ड अथवा अन्तरिक्ष से जुड़े हुए अनेक ऐसे प्रश्न हैं जो निश्चयात्मक रूप से आज तक नहीं सुलझ सके हैं। भगवान भास्कर ने स्वयं ही अनेक रहस्यों का उद्घाटन करते हुए ज्योतिषशास्त्र सम्बन्धी अनेक शंकाओं का समाधान किया है तथा ज्योतिषशास्त्र सम्बन्धी अत्यन्त गूढ़ ज्ञान दिया है। भारतीय प्राचीन विज्ञानों में अन्य विज्ञानापेक्षया ज्योतिष अत्यन्त प्राचीन विज्ञान है। वैदिककाल से ही इस शास्त्र का महत्त्व व उपयोगिता की अनुभूति हम करते आ रहे हैं। गणित, अन्तरिक्ष, भूगर्भ, कृषि, वृष्ट्यादि विभिन्न विज्ञानों का सर्वप्रथम प्रायोगिक तौर पर विवेचन ज्योतिषशास्त्र द्वारा किये जाने के कारण विश्व में इस शास्त्र की प्रतिष्ठा स्थापित है।
शास्त्रीयदृष्ट्या ज्योतिषशास्त्र की उत्पत्ति ब्रह्मा के द्वारा कही गई है। मतान्तर से यह भी माना जाता है कि प्रथम पुरुष हिरण्यगर्भ से ब्रह्मा ने ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान लेकर नारद को प्रदान किया था। ऐतिहासिक दृष्टि से ऋग्वेद के काल से ज्योतिषशास्त्र की उत्पत्ति मानी गई है। यद्यपि इस कालखण्ड में ज्योतिषशास्त्र का कोई भी स्वतन्त्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता हैं, परन्तु ज्योतिष शास्त्र के अनेक विषय वेदों के मन्त्र भाग एवं संहिता भाग से ग्रहण किये गये है। ‘ओरायन’ नामकग्रन्थ में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक महोदय ने ऋग्वेद का काल ई.पू. 4500 माना है, जबकि ‘वैदिकसम्पत्ति’ नामक ग्रन्थ में पं. रघुनन्दनशर्मा ने ऋग्वेद का रचना काल न्यूनातिन्यून 22,000 ई.पू. माना है। इसी प्रकार ज्योतिषशास्त्र का कालखंड भी इसी वेद के समान होगा। वस्तुतः ऋग्वेद का कालखण्ड निर्धारण करना सर्वथा दुष्कर है, परन्तु यह भी सत्य है कि सृष्टि की आदि से मानवजाति का मार्गदर्शक वेद ही था। इसी प्रकार विभिन्न इतिहासकार एवं प्राचीन साहित्य के रचयिता भी यह कहते हैं कि ज्योतिषशास्त्र की उत्पत्ति सृष्टि के आरम्भ काल से ही हुआ है। उस काल में मानव वन के जीव-जन्तुओं के साथ ही वन में रहते थे। मानव जीव-जन्तुओं के साथ सूर्योदय एवं सूर्यास्त की स्थिति को देखकर उसे समझने का प्रयास करता रहा होगा। कालान्तर में शनैः शनैः ज्योतिषशास्त्र का व्यवहार दैनिक जीवन में भी अपरिहार्य रूप से हुआ। आचार्य कमलाकर भट्ट ने स्वग्रन्थ सिद्धान्ततत्त्वविवेक में ज्योतिषशास्त्र के ज्ञानोपदेश का उल्लेख इस प्रकार किया है-
सर्वप्रथम ब्रह्मा से ज्योतिषशास्त्र के ज्ञान की उत्पत्ति हुई तत्पश्चात् ब्रह्मा के द्वारा नारद को ज्योतिष का ज्ञान प्रदान किया गया। इसी प्रकार क्रमशः चंद्रमा ने शौनकादि ऋषियों






















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