Devyani
बिना रुचि-लाभ के कोई कार्य क्यों किया जाये ! मानव की प्रकृति है कि बिना लोभ-लाभऔर विवशता के वह कुछ नहीं करना चाहता। प्रयोजनं विना तु मन्दोऽपि न प्रवर्तते। किसी भी लाभरूप पिपासा शान्त होनी चाहिए, भूख मिटनी चाहिए। प्रसन्नता अपेक्षित है पर प्रसन्नता पाने के भी प्रकार है, स्तर हैं काव्यशास्त्रविनोदेन कालोगच्छति धीमताम् /व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा। पर प्रसन्नता की, सुख और आनन्द की अपनी मर्यादा है। व्यक्ति की अभिवृत्ति और अभिव्यक्ति बहुत कुछ तय करती है। अभिवृत्तियाँ व्यक्ति की आत्मिक तुष्टि और तृप्ति का तरीक़ा हैं। कविता अभिवृत्तियों की मुकुटमणि है। कविता बैठे-बिठाये आनन्द कराती है और मम्मट के मत से छह प्रयोजन भी साधती है- काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये / सद्यः परिनिर्वृत्तये कान्तासम्मितयोपदेशयुजे । सबसे कम उपादानों की आवश्यता कविता को ही है और अद्भुत यह कि सबसे महत्त्वपूर्ण प्रेरणाएँ भी कविता से ही उठती मिली हैं। ललितकलाओं में काव्य सर्वोच्च और स्वयं में महान् विधा है और महाकाव्य इस महान् ललितकला का शिखरकलश। यह सब प्रकार महानता का कारक है। शास्त्रीय रूप से कहें तो बिसैबस्तु-बरनन-रस छाकै / आदि-अन्त भाँतिन्ह परिपाकै / महदुद्देश्य काहु विधि होई / महाकाव्य कहियत सब कोई। भारत में महाकाव्यों की परम्परा स्वयं में महान् विस्तार, संस्कार और विचार धारे हुए है। आदिकवि वाल्मीकि द्वारा प्रवर्तित यह महाधारा अब तक आती है। डॉ. मधु चतुर्वेदी विरचित महाकाव्य देवयानी भारतीय महाकाव्यधारा की एक अभिनव भावोर्मि है, जिसके छटि आप पर पड़ेंगे ही नहीं, आपकी आत्मा तक रसार्द्र करेंगे। अशान्ति से भरे भ्रान्तिकारी और कराल कलुषित काल में नूतन कान्ति और क्रान्ति के लिये विश्रान्ति-शान्ति पाने हेतु ऐसी भावोर्मियों में अवगाहन आवश्यक है। यह निमज्जन और भावन सचेतन और पावन करेगा।





























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