Babban Carbonate
कुमाऊँ के क़स्बों, पहाड़ी जीवन और तेज़ी से बदलते मध्यवर्ग की दुनिया को अशोक पाण्डे ऐसी क़िस्सागोई में दर्ज करते हैं, जहाँ सच और गप्प एक-दूसरे में घुलकर जीवन का अधिक सच्चा चेहरा दिखाते हैं। ‘बब्बन कार्बोनेट’ कहानियों, संस्मरणों, चरित्र-चित्रों और रिपोर्ताज की सीमाएँ लाँघती एक बेहद सरस और तीखी किताब है।
इन पन्नों में नारायणराम मास्साब से लेकर गट्टू भाई, हरकुवा गाँठी, रज्जो, पलाट वाले पापा और बब्बन कार्बोनेट तक अनेक अविस्मरणीय पात्र अपनी विचित्रताओं, कमज़ोरियों और कारनामों के साथ उपस्थित हैं। कोई विपश्यना का बखान करता है, कोई एंगर मैनेजमेंट में लगा है, कोई अपने ही बनाए सामाजिक ठाठ में उलझा है। लेखक की दृष्टि उनके हास्यास्पद व्यवहार पर ठहरती अवश्य है, लेकिन उन्हें कभी मनुष्यता से वंचित नहीं करती।
स्थानीय बोलियों की जीवंतता, बोलचाल की सहज लय, संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का खिलंदड़ा प्रयोग और ठेठ देसी व्यंग्य इस पुस्तक को विशिष्ट बनाते हैं। हँसी के नीचे यहाँ करुणा, स्मृति और हमारे समय की बेचैनी लगातार बहती रहती है। यह उन पाठकों के लिए है जो क़िस्सों में
अपने शहर, अपने पहाड़, अपने परिचित लोगों और शायद स्वयं को भी पहचान लेना चाहते हैं—और पहचानते ही हँसने के साथ थोड़ा असहज भी होना चाहते हैं। स्वाद देर तक रहेगा।






























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