बेहद लोकप्रिय और प्रमुख प्रगतिशील उर्दू कथाकार कृश्न चन्दर भरतपुर (राजस्थान) में 23 नवंबर, 1914 को पैदा हुए लेकिन उनका बचपन पुछ (जम्मू-कश्मीर) में गुज़रा। उनकी शिक्षा की शुरुआत उर्दू और फारसी से हुई। उन्होंने अंग्रेज़ी में एम.ए. और एल. एल. बी. किया मगर वकालत कभी नहीं की। लाहौर में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाक़ात भगत सिंह के साथियों से हुई और वो क्रांतिकारी गतिविधियों में लग गए जिसके लिए उन्होंने दो महीने नज़रबन्द भी रहना पड़ा। 1939 में उनकी लाहौर रेडियो स्टेशन के प्रोग्राम असिस्टेंट के तौर पर नियुक्ति हुई। इसके बाद दिल्ली में भी रेडियो स्टेशन पर काम किया। कुछ दिन बाद वो रेडियो की नौकरी छोड़ कर पुणे (महाराष्ट्र) चले गए और एक फिल्म कंपनी के लिए काम करने लगे। 1946 में वो मुम्बई आ गए और फिर वहीं रहे। यहाँ रह कर उन्होंने कई फिल्मों के लिए काम किया।
कृश्न चन्दर ने 500 से अधिक कहानियाँ और दर्जनों उपन्यासों के अलावा कितने ही आलोचनात्मक लेख लिखे। उन्होंने बच्चों के लिए भी बहुत लिखा। उनके लेखन में ठोस यथार्थवाद के साथ साथ एक अजीब रूमानी तरलता थी जो पढ़ने वालों पर जादू का सा असर करती थी। उन्हें पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू एवार्ड से सम्मानित किया गया। 8 मार्च, 1977 को दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हो गया।






























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