Aakhir Gareeb Chup Kyun Rahte Hain
भारतीय सामयिक जीवन के इस तीखे और चुभते हुए व्यंग्य से भरे रोचक वर्णन में प्रसिद्ध लेखक मनु जोसेफ़ यह पता लगाते हैं कि दुनिया के सबसे असमानता – भरे क्षेत्रों में से एक में रहने के बावजूद धनी लोगों के ख़िलाफ़ ग़रीब विद्रोह क्यों नहीं करते। ग़रीब जानते हैं कि हम एक दिन में, एक समय के भोजन पर कितना ख़र्च करते हैं, अटलांटिक सैल्मन और ऐवोकाडो की कीमत क्या है। वह पूछते हैं, ‘आख़िर वे यह सब सहते क्यों हैं? अपने विषम हालातों से रेंगते हुए बाहर आकर हमें ख़त्म क्यों नहीं कर देते? क्यों नहीं छोटे-छोटे आदमी मैनहोलों से निकलकर हमारी गाड़ियों पर हमला कर देते ? रसोईघरों में मेंढक की तरह उकडूं बैठी घरेलू कामवालियाँ अपनी उन पुण्यात्मा मालकिनों के बाल क्यों नहीं नोच डालतीं, जो उन्हें कभी एक दिन की छुट्टी तक नहीं देतीं ? इतनी शांति क्यों है ?’ यह किताब हमें पूरी निर्ममता के साथ विस्तार से बताती है कि विशेषाधिकार प्राप्त लोग कितने पाखंडी और शोषक होते हैं और यह भी कि वे कैसे और क्यों ऐसा करने में कामयाब होते हैं। जिस भारत में हम रहते हैं, यह उसकी विसंगतियों की धारदार, विनोदपूर्ण और गहन समालोचना है।






























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