Manthan
एक हृदय हो भारत जननी’ सूत्र का उच्चार तो हम अत्यंत उत्साह से करते हैं – खास तौर से १५ अगस्त या २६ जनवरी के दिन तो बडे भारी पैमाने पर ! किन्तु क्या वास्तव में इस सूत्र का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन हम करते हैं? इस सूत्र की विभावना का कार्यान्वयन हमारे देश की विभिन्न प्रादेशिक भाषाएँ, संस्कृति, धर्म ओर संस्कारों का परस्पर सहयोग, आदानप्रदान और उनके स्वीकार की अपनी क्षमता पर अवलंबित है ! स्वयं को बहुश्रुत-विद्वान प्रतिष्ठापित करने के प्रच्छन्न उद्देश से हम अक्सर शेक्सपीयर, एडगर एलन पो, हेमिंग्वे, सार्ज, काफका, कामू, आदि दरजनों विदेशी ग्रंथकारों के नाम पहाड से गिरते हुए प्रपात की तरह गुंजते रहते हैं जव भारतीय ग्रंथों या साहित्यकारों के नाम का संबंध पैदा होता है, हम बहुधा रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद आदि दो चार नामों से आगे बढनहीं पाते हैं ! कारण साफ है- हम भारतीय साहित्यकार, प्रकाशक, पाठक आदि अपनी अपनी प्रादेशिक भाषाओं के परिचय से अगर आगे उठते भी हैं तो पश्चिम दिशा की ओर दृष्टि करते हैं- हमारे देश की सभी भारतीय भाषाओं में इतनी समृध्ध रचनाएँ है जहाँ तक हम दुर्भाग्यवश पहुँच नहीं पाये हैं।
साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट आदि सरकारी और अर्ध सरकारी संस्थाएँ इस आदान-प्रदान के कार्य में कई साल से जूडी तो है परंतु ऐसी सरकार पुरस्कृत संस्थाओं के लिये भारी मात्रा में कानूनी सीमाओं के बीच कार्यवाही करनी पडती है। फलस्वरूप आदान-प्रदान के मूलगत भाव से प्रकाशित-अनुवादित-रचनाएँ भावक के हाय तक पहुँचते-पहुँचते वृध्ध हो जाती हैं। सिर्फ इन इनीगिनी संस्थाओं से काम पूरा हो नहीं पायेगा। व्यावसायिक प्रकाशनगृह और साहित्य के प्रति भारतीय संकल्पना आत्मसात करनेवाले निजी संगठनों के द्वारा यह काम अधिक मात्रा में सफल हो सकता है !
एक भयस्थान भी है-अगर प्रादेशिक भाषा के प्रकाशनगृह, अपनी अपनी भाषा के सिवा अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी भाषा के अनूदित ग्रंथ प्रकाशित करेंगे भी तो उस संबंधित भाषा में अपने प्रकाशनों को पहुँचाना उनके लिये काफी मुशकिल हो जायगा ! उनके पास, व्यावहारिक स्तर पर अन्य प्रदेशों में विक्रय व्यवस्था





























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