क्या खेत-खिलहान, गाँव-देहात और जंगल में छिपा है सेहत का खज़ाना?
आधुनिक औषधि विज्ञान प्रयोगों पर आधारित ज्ञान पर भरोसा करता है, जबकि भारत के सुदूर जंगलों में रहने वाले आदिवासियों और ग्रामीणों द्वारा अपनाया जाने वाला सदियों पुराना पारम्परिक हर्बल ज्ञान बुजुर्गों के अनुभवों को आधार मानता है।
हिन्दुस्तान के आदिवासी अंचलों पर एकत्र किए गए ज्ञान को समेटकर एक किताब के रूप में प्रस्तुत करने का उद्देश्य यही है कि इस पारम्परिक हर्बल ज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाया जाए।
दो दशकों से अधिक समय तक माइक्रोबायोलॉजी तथा इथनो-बॉटनी जैसे विषयों का गहनता से अध्ययन और बतौर वैज्ञानिक कार्य करते हुए लेखक डॉ. दीपक आचार्य ने आदिवासियों के हर्बल ज्ञान को नज़दीक से जाँचा और परखने के बाद इसे दुनिया के सामने लाए।
‘माइक्रोबायोलॉजिस्ट और बॉटनिस्ट डॉ. आचार्य मॉडर्न टाइम के एक हर्ब हंटर हैं, जिनका रुझान स्थानीय रहस्यवादी “भुमका” चिकित्सकों की ज्ञान की विरासत की सार-सम्भाल की ओर है’ – द वॉल स्ट्रीट जर्नल, वीकेंड एडीशन






























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