Janaknandini Mata Sita ki Aatmkatha
सीता का जीवन त्याग, धैर्य और समर्पण का प्रतीक है। उनकी निष्ठा, प्रेम और त्याग, वैदिक धर्म में महिलाओं के लिए एक आदर्श उदाहरण माना जाता है। प्रवाह की भावना, जनमानस में आज तक सीता का मूक स्वरूप विद्यमान है। सौम्यस्वरूपा आज्ञाकारी पुत्री का, जो बिना तर्क-वितर्क या प्रतिरोध किए पिता का प्रण पूर्ण करने हेतू या पुत्री धर्म के निर्वाह हेतू उस किसी भी पुरुष के गले में वरमाला डाल देती है, जो शिव के विशाल पिनाक पर प्रत्यंचा का संधान कर देता है। उस समर्पिता, सहधर्मिणी या सह-गामिनी पत्री का जो सहजभाव से राज्य सुख तथा वैभव त्यागकर पति राम की अनुगामिनी बनकर उनके संग चल देती है, चुनौती भरे वन्य जीवन के दुखों को अपनाने। वह एक राजकुमारी थी, चाहती तो राम के वन जाने के समय अपने मायके भी आ सकती थी। राजसी सुख भोग सकती थी या फिर अयोध्या में ही रह सकती थी, उसे वनवास थोड़े ही मिला था, वनवास तो केवल श्री राम को मिला था। सीता जी के चरित पर कई ग्रन्थ लिखे गए हैं, अधिकांश में उन्हें जगजननी या देवी मानकर पूजनीय बनाया गया है।

























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