Ek thi Hidimba
समय के परदे के पीछे खो गई अनेक स्त्रियाँ ऐसी रही हैं, जो कभी पुरुषों की शक्ति बनकर निःशब्द उनके साथ खड़ी रहीं। कुछ ने सुख की आशा में दुःख सहते हुए जीवन बिताया, तो कुछ स्वयंसिद्धा बनकर अकेले ही जीवन की चुनौतियों से जूझती रहीं। इन सबके भीतर एक भावना हमेशा गहराई में निवास करती है-प्रेम की तलाश, विश्वास से भरी मित्रता और मुड्डीभर सम्मान की आकांक्षा।
हिडिंबा भी महाभारत का ऐसा ही एक पात्र है, जिसे भीम की पहली पत्नी-बस, इतनी-सी ही उसकी परिचित पहचान है।
हिडिंबा का अध्ययन करते हुए मुझे एक निष्कपट वनकन्या मिली; एक माँ, एक पत्नी और एक स्वयंसिद्धा स्त्री के रूप में हिडिंबा मिली। किंतु क्या उसके अस्तित्व को कभी सचमुच स्वीकार किया गया? क्या उसका भिन्न संसार ही उसके विरुद्ध चला गया? हिडिंबा का संसार और भीम का संसार एक क्यों न हो सका ?
हिडिंबा की यह कथा, जैसी मुझे समझ में आई और जैसी मेरे सामने खुलती गई, वैसी ही मैं आपसे साझा कर रही हूँ।




























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