Daastan-E-Guru Dutt
‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ उस गुरुदत्त के दुःख और सृजनात्मक उल्लास की कथा है जिसने अपने वक़्त से आगे बढ़कर ‘प्यासा’, ‘काग़ज़ के फूल’ और ‘साहब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्में भारतीय सिनेमा को दीं। उस गुरुदत्त की जिसने बहुत कम उम्र में अपनी उम्मीदों-आकांक्षाओं के बाग़ों को खिलते भी देखा, और बहुत कम ही उम्र में अपने तमाम हासिल को परे रखकर उदासी की ऐसी राह पकड़ी जो कभी पलट न सकी।
गुरुदत्त की दास्तान समाज के पाखंड और इनसान के पैदा किए रिवाज़ों से असहमत हर उस बेचैन रूह की दास्तान है जो इस दुनिया को, बड़े होने के इसके तमाम दावों से इतर, वास्तविक अर्थों में इसे बड़ा देखना चाहती है। ऐसी दुनिया जहाँ कोई किसी का ग़ुलाम न हो, कोई किसी का शिकार न हो।
इस दास्तान में गुरुदत्त नाम की उस विकट पहेली की ज़िन्दगी के दृश्य भी हैं, उसकी जो फ़िल्में आज क्लासिक कही जाती हैं, उनके बनने की कहानी भी है, उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव, इश्क़, उसके शौक़ और उसकी ख़ुदकुश रचनात्मकता के क़िस्से भी, साथ ही हिन्दी सिनेमा के उस निर्णायक दौर की दिलचस्प जानकारी भी।
और यह दास्तान कही दास्तानगोई के उस्ताद महमूद फ़ारूक़ी ने!

























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