Triveni
फिल्में, पटकथाएँ, गीत – पिछले करीब चालीस वर्षों से गुलज़ार की कुछ यही पहचान रही है। लेकिन, कविता और कविता लिखना ही उनके दिल और रूह के सबसे करीब है। कविता से उन्हें कुछ ऐसा सुकून मिलता है जो शायद ही किसी और माध्यम से मिलता हो। उनके द्वारा लिखित चार कविताओं के संकलन ‘साईलेनसेस’, ‘पुखराज’, ‘चाँद पुखराज का’, व ‘ऑटम मून’ ने बहुत सफलता प्राप्त की है। यह ही नहीं, कहानियाँ लिखना भी उनके जीवन का एक अटूट हिस्सा है। ‘रावी पार और अन्य कहानियाँ उनके द्वारा लिखित बहुप्रचलित कहानियों का संकलन है। उन्हें तलाश रहती है नए फॉर्म की जिसमें वे कविता लिख पाएँ। इसी खोज का नतीजा है -‘त्रिवेणी’। ‘त्रिवेणी’ का निर्माण उन्होंने कुछ सत्ताईस अठ्ठाईस साल पहले किया था; परन्तु छपने वाला यह संकलन सबसे पहला है।
सन् १६३४, दीना में पैदा हुए, वो पाकिस्तान में रह गया। परवरिश दिल्ली में हुई, खुद बम्बई चले आए। पढ़ाई भी, कुछ हुई, कुछ नहीं हुई।
गुलज़ार ने लगभग ५० फिल्मों की पठकथाएँ लिखीं हैं, और बीचोंबीच अनेक विशिष्ट फिल्मों का निर्देशन किया है इनमें से कुछ हैं: ‘मेरे अपने’, ‘आँधी’, ‘मौसम’, ‘खुशबू’, ‘किनारा’, ‘मीरा’, ‘परिचय’, ‘लेकिन’, ‘लिबास’ और १६६७ में ‘माचिस’, जिसके लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से देश भर में सम्मानित किया गया था। गुलज़ार ने दूरदर्शन के लिए दो सीरियल भी बनाए हैं- ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ और ‘किरदार’।
उनके कहानी मजमुआ ‘रावी पार और अन्य कहानियाँ’ ने बहुत लोकप्रियता हासिल की है। यह हिन्दी, मराठी, बंगला और अंग्रेज़ी में भी छप चुकी है।
नज़्में लिखीं, तो कहानियाँ छपीं।
गीत लिखे, तो निर्देशन में पड़ गए।
कहानियाँ लिखीं, तो पटकथाओं में ख्याति पाई,
ऐसा ही कुछ सिलसिला अब तक जारी है।



























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