Mohabbat Naa Samajh Hoti Hai
वसीम के कलाम में आगही और शुऊर की तहों का जायप्ता है और ऐसा शुऊर-ओ-आगही जो कैफ़-ओ-सुरूर का गुलदस्ता है। ये अक्सर खद्द-ओ-खाल से बुलन्द हो कर कायनात की रंगीनियों और दिलकशियों से लुत्फ़ हासिल करते हैं। शायरी भी दर-अस्ल वही शायरी है’ जो अपने वुजूद से हमें जिन्दगी की नज़दीक तर चीज़ों का एहसास दिलाती है। वसीम की शायरी एहसास-ए-हयात की एहसास-अफ़्ज़ा शायरी है। और इस आईना-ए-एहसास में दूर के अक्स नज़दीक पर जिला कर रहे हैं, लेकिन वसीम हर अक्स के दरमियान मुस्तक्रिल वुजूद का एहसास दिला रहे हैं।




























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