मधु, महान साहित्यकार गुरुदत्त की ऐसी रचना है, जिसे आपातकाल के दौरान प्रतिबंध का दंश झेलना पड़ा था। लेखक को इसके लिए भारी जुर्माना भी भरना पड़ा था और तिहाड़ जेल की सजा काटी वह अलग। लेकिन बाद में कोर्ट में लंबी लड़ाई के बाद इस रचना से प्रतिबंध हटाया गया और अब यह रचना पाठकों के बीच एक बार फिर आ गई है। इस पुस्तक में सामाजिक चेतना की ऐसी प्रेरक एवं संघर्षपूर्ण कहानी है जो हर किसी को चिंतन एवं मंथन करने के लिए विवश कर देती है।
नई-पुरानी मान्यताओं के संघर्ष की कहानी
एक अत्यंत रोचक एवं बहुचर्चित उपन्यास
आज आते ही रामू ने पूछा, “बाबा आज रेडियो पर गाया जा रहा था,
‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा’।”
“हाँ।” बाबा ने कहा।
“वह कहाँ है ?”
“क्या कहाँ है?”
“हिन्दुस्तान !”
“तुम्हारे देश का क्या नाम है?”
“भारत।”
“बस वही हिन्दुस्तान है।”
“नाम बदला क्यों है?”
“पहले यह देश हिन्दुओं का था, इस कारण इसका नाम हिन्दुस्तान था। हिन्दुस्तान का अर्थ है हिन्दुओं का स्थान। अब यह हिन्दुओं का देश नहीं, इस कारण इसका नाम हिन्दुस्तान नहीं रहा।”
“तो अब यह देश किसका है?”
– इसी उपन्यास से




























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