Koi Nahin Janta
इस पुस्तक के बारे में स्वयं अमृता प्रीतम ने लिखा है : बरसों बीत गए, प्यार की नदी से आंखों की मटकियां भरी थीं। आज तक उन्हें भूमि पर नहीं रखा है, इस बहंगी को कंधे पर उठाए घूम रही हूं। सिर्फ चुप हूं बोल नहीं सकती। यह पुस्तक अपने आप में अद्भुत भाषा शैली को समेटे हुए है।























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