धर्म का शिखर छूने का रहस्य
यह पुस्तक ओशो की जो बोलै तो हरिकथा के सभी प्रवचनों का एकमात्र प्रामाणिक संकलन है।
इस पुस्तक में ओशो ने धर्म के रहस्यवाद, धर्म और सद्गुरु, ध्यान- प्रेम – समर्पण, जीवन्त अद्वैल, प्रेम से धर्म के शिखर तक आदि की विस्तार से चर्चा की है।
मन को मोह लेने वाली कथाओं और उदाहरणों के माध्यम से ओशो ने हरिकथा, जीवन्त धर्म, झूठा धर्म व राजनीति की विशेष रूप से चर्चा भी की है।
विवाह के बारे में ओशो कहते हैं कि मैं विवाह का कोई भविष्य नहीं देखता हूं और अगर विवाह रहा तो आदमी का कोई मविष्य नहीं देखता हूँ।
धर्म को रसं बताते हुए ओशो का मानना है कि कोई झरोखा चाहिए, जिससे तुम इसमें झांक सको। शब्द काम नहीं देंगे। शास्त्र काम नहीं देंगे। जानकारी और ज्ञान काम नहीं देगे। ध्यान ही काम दे सकता है।
राजनीति और धर्म यो संका के बारे में शाि कि धर्म का सम्यक स्वरूप तो सदा राजनीति से दूर है। झूठो धर्म निश्चित ही राजनीति का ही एक अंग है। झूता धर्म हमेशा राजनीति के साथ साठगांत




























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