आज से सौ वर्ष पूर्व अवतरित स्वामी विवेकानन्द की जन्म शताब्दी मनाने के लिए सम्पूर्ण देश में बड़े उत्साह के साथ तैयारियाँ की जा रही हैं। अतः उस महान् योगी के जीवन एवं उपदेशों का पुनः अध्ययन एवं मनन करने की प्रबल इच्छा भी समाज में उत्पन्न होना स्वाभाविक है। श्रीरामकृष्ण परमहंस के महान शिष्य के रूप में, विगत छः शताब्दियों में वे प्रथम हिन्दूधर्म प्रचारक संन्यासी थे जो देश-देशान्तरों में गये और जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र के सनातन धर्म का संदेश पुनः विश्व को दिया। एक महान देशभक्त, समाज सुधारक और संगठक के अतिरिक्त राष्ट्रीय पुनरुत्थान की शक्तियों को संगठित एवं परिचालित करनेवाले वे प्रथम व्यक्ति थे और उन्होंने अंग्रेजी शासन के प्रथम आघात से विश्रृंखलित और पराभूत राष्ट्र के पुनर्निर्माण का पथ-प्रशस्त किया। उन्होंने ही देश को उसके चेतना केन्द्र ‘धर्म’ के प्रति जागरूक कर पुनर्जाग्रत भारत की आधारशिला रखी और आध्यात्मिक भारत के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने इस बात का दृढ़ शब्दों में प्रतिपादन किया कि केवल धर्म के चारों ओर ही हिन्दू राष्ट्र को उसके लक्ष्यानुकूल दिशा में प्रभावकारी ढंग से संगठित किया जा सकता है।
पर जिस समय भारतीय जनसमाज उक्त महापुरुष के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करने की तैयारी कर रहा था और शताब्दी समारोह समितियाँ कुछ सक्रिय हुई थीं तभी राष्ट्र को प्रबल धक्का लगा और उसने यह अनुभव किया कि उसे अपनी सम्पूर्ण शक्ति उत्तर से आये विश्वासघाती और बर्बर शत्रु के संगठित आक्रमण का प्रतिकार करने में लगानी है। एक ओर तो चीन द्वारा हमारे ही छिने हुए भू-भाग के बारे में समझौता एवं मैत्री-वार्ता के आवरण में की गई शत्रुता, युद्ध की तैयारियाँ तथा दूसरी ओर हमारे शासकों की स्वप्निल और काल्पनिक जगत् में विचरण करने की प्रवृत्ति के कारण उस समय देश पूर्णतया हक्का-बक्का रह गया, जब शत्रु ने हिमालय को लाँधकर व्यापक एवं नग्न आक्रमण किया।
आज की यह परिस्थिति स्वामी विवेकानन्द के सन्देश को एक नया महत्त्व प्रदान करती है। इसका कारण यह है कि उनका सन्देश शक्ति का था जिसमें शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति और इच्छा-शक्ति का समावेश किया गया था। यही शक्ति आज के समय की सबसे महती आवश्यकता है। स्वामी विवेकानन्द ऐसे राष्ट्र-शरीर की रचना करना चाहते थे “जिसकी माँसपेशियाँ लोहे की और शिराएँ इस्पात की बनी हों






























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