Mere Donon Banaras
मेरा पहला कविता-संग्रह ‘मैं समस्त बन जाऊँ’ मेरे लिए एक सुखद संयोग की तरह था। उस वक़्त, ना ही इस बात की लालसा थी और ना ही मनोभाव कि दूसरी किताब भी एक संभावना हो सकती है। लिखने के लिहाज़ से मेरे लिए किताब का सबसे कठिन अंश किताब की भूमिका है। भूमिका लिखने में एक औपचारिक नुमाइश होती है जिसमें चाहे-अनचाहे किताब को पसंद करने का आह्वान-सा होता है। साथ ही इस बात की भी भयावह संभावना बनी रहती है कि पढ़ने वाले को भूमिका पढ़कर ही ऐसा लगे कि यह किताब एक नौसिखिए ने लिखी है।
इस किताब का नाम ‘मेरे दोनों बनारस’ है और यह नाम एक सांकेतिक नाम है। बग़ैर बनारस गए किताब के नाम में ही बनारस रख देना मुझे भी धृष्टता-सी लगी थी। बनारस के बारे में पढ़कर, सुनकर और कल्पना के ज़रिए मेरे भीतर बनारस का एक प्रतिबिंब बना हुआ है। उस प्रतिबिंब में बनारस सिर्फ़ एक जगह होने की हदें तोड़ चुका है। किताब में आपको शायद सिर्फ तीन कविताओं में ही बनारस मिले। लेकिन अगर आप खोजेंगे तो शायद आप लगभग सभी कविताओं में बनारस पाएँगे।
एक दिन प्रेम और अगले दिन मृत्यु पर लिखना या सोचना, क़तई विरोधाभासी लगता है। लेकिन यह भी संभव है कि ख़ुद की नश्वरता का ज्ञात, प्रेम को और ज़रुरी बनाता है। अमरता के बोध में हमारे पास ईर्ष्या और नफ़रत के लिए काफ़ी वक़्त होता है, लेकिन हर पल मरती देह को मालूम होना चाहिए कि प्रेम करने का सबसे सही वक़्त ‘अभी’ है। मेरी कविताएँ मूलतः या तो मृत्यु या फिर प्रेम के इर्द-गिर्द रहती हैं। बनारस मेरे लिए प्रेम भी है, मृत्यु भी है।
-सौरभ भुवानिया






























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