Mustafa
आप कौन-सी नैतिकता की बात कर रहे हैं? यदि आपको नैतिकता की इतनी ही चिंता थी तो हमें वहीं ऊपर ही रहने देते, क्यूँ भेजा यहाँ नीचे, अपने मनोरंजन के लिए? हम यहाँ नीचे सड़ते रहें और आप हमारे दर्द का मज़ा लूट सकें, यही चाहते थे आप? आपने हमें जंगली जानवर दिए, कठोर पर्वत दिए, खारे समंदर दिए। आपने हम पर सर्दी बरसाई, गर्मी बरसाई, बरसात की, बर्फ़ गिराई! अरे आपने हमें ओलों से मारा, हमारे जिस्मों को लू की भट्टी में सेका। इतने पर भी आपका पेट नहीं भरा तो आपने जल में मगरमच्छ, थल पर शेर और वायु में बाज़ के रूप में मौत को हमारे पीछे लगा दिया। जब हमने आपके बाहर के ख़तरों पर विजयी पा ली तो आपने हमारे भीतर जानलेवा रोगाणु और विषाणु छोड़ना शुरू कर दिए। बाहर से नहीं मरते तो अंदर से मार दो सालों को! मरने दो सालों को कैंसर से, डाइबिटीज़ से, ब्लड प्रेशर से! आपको पता भी है जब किसी को यह रोग लगता है तो उसकी हालत कैसी हो जाती है? हुआ है आप में से कभी किसी को यह रोग?” आका की साँस फूल आई। उनका ग़ुस्सा उनके ललाट पर पसीना बन फूटने लगा। देव चुपचाप खड़े थे, ऐसे जैसे आका के कोई मंत्री हों। आका बोले, “बदले में, बदले में हमने उफ्फ़ तक नहीं किया, ना हमारी महिलाओं ने, ना हमारे बच्चों ने! हम सब कुछ सहते रहे, हम दिन-रात लड़ते रहे, तब जाकर इस धरती पर खड़े रहने लायक हो पाए। इस धरती पर हमने अपने पैर नैतिकता के बल पर नहीं, शक्ति के बल पर जमाए हैं। हमें बहुत पहले ही यह समझ आ गया था कि अगर शेर का शिकार नहीं बनना है तो शेर को शिकार बनाओ।





























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