Drop Year
नीट की तैयारी करने वाले सोलह-सत्रह साल के बच्चे, बल्कि उससे भी कम, जो अभी पूरी तरह बड़े भी नहीं हुए जिन्हें दुनियादारी सीखने के लिए कोटा भेज दिया जाता है। कभी उनसे यह तो पूछा ही नहीं गया–“आख़िर वो कैसे हैं? उनके मन में क्या है?” बस डॉक्टर-इंजीनियर का तमगा उनके सर मढ़ दिया जाता है। उनको बारह-तेरह साल की उम्र से एक फैक्ट्री में भेज दिया जाता है जहाँ मशीन उन्हें स्टेप वाइज स्टेप फाउंडेशन, फंडामेंटल बिल्डिंग, इंटेंसिव प्रीप्रेशन और भी कई सारी नाम की तैयारी कराई जाती हैं। उन्हें यही सपने दिखाए जाते हैं–नीट निकाल लोगे तो ज़िंदगी सँवर जाएगी, आईआईटी निकाल लोगे तो अच्छी कंपनी में नौकरी मिल जाएगी। लेकिन अगर फेल हुए तो क्या? इस सवाल का जवाब आज तक कोटा नहीं दे पाया क्यूँकि वह तो इन बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने में लगा हुआ है। ड्रॉप ईयर उन्ही बच्चों के बारे में, उनकी इस यात्रा के बारे में कोचिंग, परिवार और करियर की सीढ़ी में सिर्फ़ एक रैंकर की भागदौड़ में कैसे पिसते हैं, के बारे में हैं। यह किताब उन सभी स्टूडेंट्स के संघर्षों को समर्पित है जो कहीं न कहीं एक कहानी बनकर हम सभी के ज़ेहन में रह गए।





























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