ये उपन्यास न तो पूरी तरह से असफल प्रेमकथा है और न प्रेम में सबकुछ छोड़कर बेवजह जीवन बर्बाद कर उसे मिटाने की खबर, बल्कि कभी न हारने और स्वयं को समेटकर आगे बढ़ने की जिजीविषा है। ये ऐसे त्याग, समर्पण और निर्णयों की कथा है जो अनेक संघर्षों और मानसिक द्वंद्वों के बावजूद सहज मानवीय जीवन को गहराई से संवारता है, अर्थ देता है। ‘अरण्य माँ’ जैसे पात्र यूं ही नहीं बनते इन्हें समय और सकल्प गढ़ता है। शायद इसीलिए ये दूसरों के लिए बार-बार अपने जीवन को संकट में डालने से गुरेज नहीं करते और ऐसे पदचिन्ह छोड़ जाते हैं जिन पर चलना लोगों के लिए गर्व और आत्मानंद की बात होती है। यदि जंगल में पग-पग पर मौत की आहट सुनाई देती है तो वहीं सहज जीवन का उल्लास भी कभी कम नहीं पड़ता, बस…
”
सुरेन्द्र कुमार नायक
जन्म: 20 अगस्त, 1954, औरैया, जनपद-औरैया (उ.प्र.)
शिक्षा: एम.एस.सी., सी.ए.आई.आई.बी., डी.ई.एल.पी.एच. आई.।
व्यवसाय भूतपूर्व बैंक प्रबन्धक, केनरा बैंक।
संप्रति. लेखन एवं एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति पर शोध कार्य।
साहित्यिक अवदानः
1. प्रकाशित उपन्यास : ‘प्रतिप्रश्न, ‘कितनी सत्ताएं’, ‘अनुबंधों में अंतराल’, नेफ्रोवार्ड, सांडा ढले एवं रिश्तो की छाँह, 2. प्रकाशित कविता संग्रह ‘अहल्या’ 3. अप्रकाशित – 5 उपन्यास, 5 कहानी संग्रह, 2 कविता संग्रह, 1 नाटक संग्रह, 1 डायरी, 2 व्यंग्य संग्रह, 1 समीक्षात्मक आलेख आदि। 4. कविता, कहानियाँ आलेख, व्यंग्यवार्ता, समीक्षा, रुपक, नाटक, संस्मरण, डायरी अंश आदि देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित।
पुरस्कार/सम्मान: 1. साहित्य श्री सम्मान 2015, गोंडा (उ.प्र.), 2. प्रथम पुरस्कार अखिल भारतीय आदिवासी कविता प्रतियोगिता-2008 अरावली उद्घोष उदयपुर, 3. प्रथम पुरस्कार अखिल भारतीय आदिवासी कहानी प्रतियोगिता-2010 अरावली उद्घोष उदयपुर 4. लगभग 20 अन्य संस्थाओं द्वारा सम्मान/अभिनन्दन ।




























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