प्रेम से बड़ी आग नहीं है दुनिया में, प्रेम है अकेला जो आत्मा को जलाता है और निखारता है।’
-ओशो
प्रेम – पंथ ऐसो कठिन ओशो के प्रश्नोत्तर प्रवचनों का अद्भुत सकलन है यह। इसमें प्रेम पर विस्तृत चर्चा की गई है। प्रेम को ओशो निर्मोही मानते हैं। प्रेम न तो कब्ज़ा करता है और न अपने पर कब्जा होने देता है। प्रेम तो दो लोगों के बीच स्वतंत्रता का आदान-प्रदान करता है। प्रेम मुक्तिदायी है। प्रेम के बारे में ओशो कहते हैं कि यह प्रेम तो अकूत है, अपार है, अथाह है। समझ में नहीं आएगा। लाने की चेष्टा भी न करना। आनंद के संबंध में ओशो मानते हैं कि आनंद को पकड़ने की जरूरत नहीं है। आए तो स्वागत कर लेना, जाए तो अलविदा कह देना। उदासी में भी आनंद है। क्योंकि है तो आनंद का ही पहलू है तो उसका ही दूसरा पहलू ।











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