Jakasa Kavya Manjusha
सभ्यता, संस्कृति, भाषा एवं साहित्य का विकास एक सतत प्रक्रिया है। इनके विकास क्रम में आरम्भ की सुनिश्चित तिथि का निर्धारण करना बहुत कठिन होता है।
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फिर भी हिंदी भाषा साहित्य के इतिहास को लगभग एक हजार वर्ष का माना जा सकता है। भिन्न-भिन्न विद्वानों ने इस काल-खंड को उस समय की सामान्य साहित्यिक प्रवृत्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार से विभाजित किया है। तथापि यदि भारतेंदु-युग से वर्तमान समय तक के कालखंड को हिंदी कविता का आधुनिक काल कहा जाए तो इस अवधि में भी हिंदी कविता ने अनेक कलेवर धारण किए हैं। अपनी इस विकास-यात्रा में हिंदी कविता ने छायावादी कविता, प्रगतिवादी कविता, प्रयोगवादी कविता, नयी कविता, अकविता, जनवादी कविता और समकालीन कविता के अनगिनत नाम एवं अलंकरण धारण किए हैं। कभी छंद को कविता का आवश्यक अंग माना गया तो कभी छंद को कविता में भाव की अभिव्यक्ति पर बोझ की तरह देखा गया। कभी गीत ही कविता का सर्वाधिक लोकप्रिय एवं मानक स्वरूप स्वीकार किया गया तो कभी गीत को कविता के आसन से उतार कर साहित्य से निर्वासित कर देने के प्रयास किए गए। अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए गीत ने भी अपना स्वरूप बदला और वह पारम्परिक शैली, बिम्ब और प्रतीकों को त्याग कर नयी शैली, नए बिम्ब-विधान और नए प्रतीकों के साथ सामयिक सामाजिक सरोकारों को सम्बोधित करने को तैयार हुआ। इन समस्त परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि हम कविता को किस प्रकार परिभाषित करें। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘कविता क्या है?’ से लेकर आज तक अनेक विद्वानों ने कविता के मानक स्वरूप को परिभाषित करने का प्रयास किया है। किंतु यदि सभी की विस्तृत चर्चा को स्थगित कर दिया जाए तो अधिकतर ने यह भी स्वीकार किया है कि कविता परिभाषित करने की वस्तु नहीं है बल्कि यह पढ़ने, सुनने और आनंदित होने की एक साहित्यिक विधा है। यह सौंदर्य के अमूर्त रूप को सुघड़ आकार देने की कला है। शब्दों के माध्यम से यह मनुष्य की भावनाओं, अनुभवों और विचारों को कलात्मक रूप से अभिव्यक्त करने का प्रभावी माध्यम है। जब मनुष्य का हृदय भावों, विचारों और संवेदनाओं से लबालब भर जाता है तो उसकी आंतरिकता से शब्द रूप में जो रस छलकने लगता है, वही कविता है






























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