Jad
समाज की जड़ों में फैली क्रूरता, अन्याय और अमानवीय व्यवस्था के बीच भी कुछ लोग परिस्थितियों से टूटते नहीं, बल्कि संघर्षों के बीच अपनी उम्मीद और मानवता को जीवित रखते हैं। ‘जड़’ ऐसे ही पात्रों की संवेदनशील और प्रेरणादायी कथा है, जो बाहरी और भीतरी संघर्षों से जूझते हुए अपने अस्तित्व, आत्मसम्मान और सपनों को बचाए रखने का साहस करते हैं। कभी वे कमज़ोर पड़ते हैं, तो कभी अपनी जड़ों से शक्ति पाकर फिर खड़े हो जाते हैं।
यह उपन्यास केवल समाज की विसंगतियों और अन्याय का चित्रण नहीं करता, बल्कि दिखाता है कि बुराई के विरुद्ध संघर्ष विनाश नहीं, परिवर्तन और आत्मजागरण का मार्ग भी बन सकता है। इसमें पुरुषार्थ चतुष्ट्य, विश्वमानव की अवधारणा, अध्यात्म का मधुर रस, समाजसेवा की भावना और बुद्ध की करुणामयी वाणी जैसे तत्व प्रभावशाली रूप में उभरते हैं। प्रेम, वात्सल्य, करुणा, त्याग, स्वार्थ, घृणा और मानवीय दुर्बलताओं को संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करती यह कृति धर्मांधता, जातिभेद, व्यभिचार और सामाजिक कुरीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।
‘जड़’ केवल एक सामाजिक उपन्यास नहीं, बल्कि वर्तमान समय का जीवंत दस्तावेज़ है, जो शांति, सह-अस्तित्व, मानवीय मूल्यों और जीवन की जड़ों से जुड़ने का संदेश देता है। यह कृति पाठक के अंतर्मन को झकझोरते हुए उसे संघर्ष, संवेदना और मानवता के नए अर्थों से परिचित कराती है तथा एक बेहतर और अधिक मानवीय समाज की संभावना को उजागर करती है।





























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