Bagula Ke Pankh
साहित्य समाज का दर्पण होता है, समाज का प्रतिबिम्ब होता है और समाज का लेखा-जोखा होता है। किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से ही प्राप्त होती है। साहित्य लोक-जीवन का अभिन्न अंग है। विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की।
जब हमारा देश स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था, तो उस समय जो भी साहित्य लिखा गया है, वह वास्तव में त्याग से भरी वीरों की कहानियाँ हैं, लेकिन जैसे ही हमें स्वतंत्रता मिली, वैसे ही सत्ता में कुछ ऐसे लोग भी प्रभावी हो गए, जिनका स्वतंत्रता की जंग से कोई लेना-देना नहीं था। स्वतंत्रता मिलने के बाद ऐसे स्वार्थी लोगों के कारण समाज एवं सत्ता में त्याग एवं बलिदान के स्थान पर धोखाधड़ी, ख़ुदगर्जी और व्यभिचार के अंकुर पनपने लगे और इस उपन्यास की कहानी इन्हीं स्वार्थी लोगों को आधार बनाकर लिखी गई है।
निस्संदेह धोखाधड़ी एक संगीन अपराध है। यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि यह सार्वजनिक विश्वास को प्रभावित करता है। इसी के साथ स्वार्थभावना और व्यभिचार किसी भी समाज को पतन की ओर ले जाता है। समाज को पतन से बचाने के लिए आचार्य चतुरसेन ने इस उपन्यास की कथा को बहुत ही रोचक शैली में लिखा है।























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