Devguru Brahrishi Brihaspati
ब्रह्मर्षि अंगिरा एवं सुभा के सप्तम पुत्र देवगुरु बृहस्पति का प्राकट्य अंगिरा की घोर तपस्या से उद्भुत दिव्य अग्नि-पुंज से हुआ। अग्निदेव ने अंगिरा को अपना प्रथम पुत्र स्वीकार किया, जिससे बृहस्पति को अनुपम तेज प्राप्त हुआ। अपनी पत्नी तारा से उन्हें शंयु और स्वाहा सहित सात संतानें प्राप्त हुई, जो अग्नि के विभिन्न स्वरूपों के अधिपति बने। बृहस्पति के वंशजों ने सृष्टि की यज्ञीय व्यवस्था एवं ऊर्जा प्रवाह को अक्षुण्ण रखने में युगांतरकारी भूमिका निभाई।
देवगुरु बृहस्पति देवताओं के अप्रतिम नीति-निर्देशक एवं संकटमोचक थे। इंद्र द्वारा किए गए अपमान के उपरांत उनके अंतर्ध्यान होने से देवलोक श्रीहीन हो गया, जिसे उन्होंने पुनः अपनी सूक्ष्म युक्ति से नहुष का पतन कराकर वैभवशाली बनाया। उन्होंने कूटनीतिक चातुर्य से शुक्राचार्य का छद्म रूप धारण कर दैत्यों को शास्त्र-विरुद्ध उपदेशों से भ्रमित किया, जिससे देवशक्ति सुदृढ़ हुई। इस प्रकार उन्होंने अपनी मेघा से सदैव देवराज और देवकुल की रक्षा की।
देवगुरु बृहस्पति का स्वरूप एक गंभीर दार्शनिक और मार्गदर्शक का है, जिन्होंने वसुमना, इंद्र और युधिष्ठिर को धर्म एवं राजनीति की सूक्ष्मताओं से दीक्षित किया। उनकी ‘बृहस्पति नीति’ आज भी ज्ञान का आधार स्तंभ है। उन्होंने अपने पुत्र कच को ब्रह्मज्ञान देकर जीवन्मुक्त किया। जीव की गतियों, गर्भधारण और अन्नदान की महिमा पर उनके विशद उपदेश प्रमाणित करते हैं कि उनका ज्ञान संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण हेतु समर्पित था।
देवगुरु बृहस्पति के चरित्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी लोक-कल्याणकारी दृष्टि है। उन्होंने चित्रकूट में भरत के प्रति देवताओं के संशय को अपनी प्रज्ञा से दूर किया और प्रमाणित किया कि श्रीराम के भक्त कभी अहितकारी नहीं हो सकते। दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शिव-गण वीरभद्र के कोप से देवताओं की रक्षा करनी हो या पितरों और देवदूतों के संवाद के माध्यम से श्राद्ध की महिमा को प्रतिपादित करना, बृहस्पति सदैव मर्यादा के रक्षक रहे। उन्होंने जीवन और मृत्यु के चक्र को समझाते हुए स्पष्ट किया कि मनुष्य अपने कर्मों के





























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