मालवण पत्तन (बंदरगाह), उसकी गोद में उगे बढ़े नारियलों के घने कुंज, सदा शांत और नीरव रहने वाले। किन्तु आज उनकी उस नीरव शान्ति को घोड़ों की टापों और टापों की प्रतिध्वनियों ने भंग कर दिया था। नारियल के वृक्षों के तनों से बँधे ये अश्व अपने पदचालन (टापों) से और पूँछों की चॅवरी से जंगली मक्खियों को उड़ाते खड़े थे। बीच-बीच में गले में बँधी डोरियों को झटकते, स्वभाववश धरती पर अपने थूथन लगाकर फुर्र-फुर्र करते हुए आसपास उगी घास और दूब में मुँह मार लेते थे। इन्हीं में एक सारंगा घोड़ा मुँह में बँधे तोबरे में से दाना खाने में जुटा था। उसके गले में बँधी डोरियों को पकड़कर दोनों ओर दो सईस बैठे थे।
इन अश्वों के स्वामी, बड़े-बड़े पदाधिकारी सागर-तट पर उत्सुकता, आश्चर्य और विस्मय से भरी आँखों से सामने क्षितिज तक पसरे समुद्र को निहार रहे थे। इन अधिकारियों से कुछ दूरी पर बालू में भाला गाड़कर उसी के सहारे टिक कर खड़े सैनिक भी सागर के उस असीम और गंभीर विस्तार को अपलक देख रहे थे।
इन में से बहुतों ने प्रथम बार समुद्र को देखा था। उनके हृदय में एक विस्मय का भाव था। जिधर देखें उधर पानी ही पानी! जल ही जल !!
ऊँची-ऊँची लहरें गर्जन-तर्जन करतीं, आपस में भिड़तीं। उनकी उस क्रीड़ा से उड़ती हुई जल की अति लघु बूँदें सूर्य की किरणों में दमकतीं। कैसा मनोहर और अनोखा, विलक्षण दृश्य था! उन सैनिकों में कुछेक अपने चूड़ीदार पाजामे ऊपर खिसकाकर सागर के पानी में उतरे, क्षण भर में दौड़ती आती लहर ने उन्हें कमर तक भिगो दिया। वे सभी डरकर भागते तट पर आये। कुतूहल से किसी-किसी ने चुल्लूभर पानी मुँह में डाल ही लिया, और दूसरे ही क्षण धू-धू करते फिरे। उनकी फजीहत को देखकर अन्य सभी हँसने लगे। किन्तु उस हँसी में भी एक मर्यादा थी। पास ही उनके अधिकारी जो खड़े थे। एक कारण और भी था। कुछ दूरी पर इस सारे कोलाहल से अनभिज्ञ, इन सैनिकों तथा अधिकारियों के प्रिय सखा, राजा शिवाजी सागर की मर्यादा निरख रहे थे। इस राजा को सागर में दूर एक एकाकी द्वीप दिखाई दे रहा था। उनकी दृष्टि उसी पर स्थिर थी। हाथ में गोल मुड़ा हुआ मानचित्र था जिसे बीच-बीच में खोलकर वे उस द्वीप को उसमें चीन्ह रहे थे।
राजा शिवाजी के पीछे थोड़ा सा अन्तर रखकर मोरोपन्त पिंगले और हीरोजी इंदुलकर खड़े थे। बीच-बीच में शिवाजी गोविन्द विश्वनाथ से कुछ पूछताछ करते, दृश्य को देखते, पहचानते और फिर अपने विचारों में डूब जाते। कुछ दूर पर नाविक हड़बड़ाहट में दौड़-भाग कर रहे थे। उन पर तासाजी चिल्ला रहा था- “तुम्हें कितनी बार जताया था! फिर भी तुम्हें देर करनी थी, सो की ही।”






























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